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    Home»देश - विदेश»SC/ST Act High Court Verdict : SC/ST एक्ट पर अहम टिप्पणी हाईकोर्ट ने निचली अदालत की सजा की निरस्त
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    SC/ST Act High Court Verdict : SC/ST एक्ट पर अहम टिप्पणी हाईकोर्ट ने निचली अदालत की सजा की निरस्त

    Santosh RajakBy Santosh RajakJanuary 31, 2026No Comments3 Mins Read
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    SC/ST Act High Court Verdict  , नई दिल्ली/प्रयागराज — अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की जाति का नाम लेना मात्र इस विशेष अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार, जब तक अपमान करने या नीचा दिखाने की स्पष्ट मंशा (Mens Rea) साबित न हो, तब तक इसे ‘अत्याचार’ की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा।
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    निचली अदालत का फैसला पलटा: क्या था पूरा मामला?

    यह मामला एक पुरानी रंजिश से जुड़ा है, जिसमें निचली अदालत ने आरोपी को सिर्फ इस आधार पर दोषी करार दिया था कि उसने बहस के दौरान शिकायतकर्ता की जाति का संबोधन किया था। मामले की समीक्षा करते हुए माननीय न्यायाधीश ने पाया कि एफआईआर (FIR) और गवाहों के बयानों में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं था कि जाति सूचक शब्द का इस्तेमाल उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के इरादे से किया गया था।

    • सार्वजनिक स्थान की अनिवार्यता: अदालत ने दोहराया कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध तभी बनता है जब अपमान ‘Public View’ (जनता की मौजूदगी या सार्वजनिक दृष्टि) में हुआ हो।
    • मंशा का अभाव: केवल आपसी विवाद में अनजाने में जाति का नाम लेना अपमान की श्रेणी में नहीं आता।
    • साक्ष्यों की कमी: अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि शब्दों का चयन पीड़ित को उसके वर्ग के कारण लक्षित करने के लिए किया गया था।

    अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी

    “SC/ST अधिनियम का उद्देश्य समाज के वंचित वर्गों को सुरक्षा प्रदान करना है, लेकिन इसका उपयोग किसी को केवल इसलिए फंसाने के लिए नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने बातचीत में जाति का उल्लेख किया है। अपमानजनक मंशा के बिना जाति का नाम लेना कानूनन अपराध नहीं है।”
    — माननीय न्यायाधीश, संबंधित बेंच

    आम नागरिकों पर प्रभाव और कानूनी समझ

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन मामलों में कमी आएगी जहां निजी विवादों को जातिगत रंग देकर भारी धाराओं में मामला दर्ज करा दिया जाता है। यह आदेश स्पष्ट करता है कि पुलिस और जांच एजेंसियों को चार्जशीट दाखिल करने से पहले ‘Intent to Humiliate’ (अपमानित करने की मंशा) की गहराई से जांच करनी चाहिए।

    आने वाले समय में, यह फैसला जिला अदालतों के लिए नजीर बनेगा, जिससे निर्दोष लोगों को लंबी कानूनी प्रक्रिया से राहत मिल सकेगी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि कोई जानबूझकर जातिगत टिप्पणी कर सामाजिक सद्भाव बिगाड़ता है, तो कानून अपनी पूरी सख्ती से काम करेगा।

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